चैत्र नवरात्र का पर्व बहुत ज्यादा शुभ माना जाता है। इस साल यह 30 मार्च यानी आज से शुरू हो रहा है।
नवरात्र का पहला दिन मां शैलपुत्री की पूजा के लिए समर्पित है। इसके साथ ही इसी दिन घटस्थापना भी किया जाता है।कहा जाता है कि मां दुर्गा की उपासना सच्ची भक्ति के साथ करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इसके साथ ही जीवन में खुशहाली आती है, इस दिन की पूजा में किसी भी तरह की बाधा न आए। ऐसे में आइए यहां इससे जुड़ी जरूरी बातों को जान लेते हैं।
कैसा है मां शैलपुत्री का स्वरुप
नवरात्रि के पहले दिन पूजा जाने वाली देवी मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत शांत, सरल, सुशील और दया से पूर्ण है। मां का रूप दिव्य और आकर्षक है। उनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प शोभायमान है, जो उनके अद्भुत और शक्ति से भरे स्वरूप का प्रतीक है। मां की सवाली वृषभ है । मां शैलपुत्री का तपस्वी रूप बहुत ही प्रेरणादायक है, उन्होंने घोर तपस्या की है और समस्त जीवों की रक्षिका हैं। नवरात्रि के पहले दिन का व्रत और पूजा विशेष रूप से कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है। विपत्ति के समय में मां शैलपुत्री अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं। मां शैलपुत्री साधक के मूलाधार चक्र को जागृत करने में भी सहायक होती हैं। मूलाधार चक्र हमारे शरीर का वह ऊर्जा केंद्र है, जो हमें स्थिरता, सुरक्षा और मानसिक शांति प्रदान करता है। इस चक्र के जागरण से जीवन में सकारात्मकता और समृद्धि का प्रवाह होता है।
कलश स्थापना की विधि:-
वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 29 मार्च, 2025 को दोपहर 04 बजकर 27 मिनट पर शुरू हो चुकी है। वहीं, इस तिथि का समापन 30 मार्च को दोपहर 12 बजकर 49 मिनट पर होगा। उदया तिथि को देखते हुए चैत्र नवरात्र की शुरुआत 30 मार्च यानी आज से हो रही है। इसके साथ ही पहला कलश स्थापना मुहूर्त सुबह 06 बजकर 13 मिनट से सुबह 10 बजकर 22 मिनट तक रहेगा।
वहीं, दूसरा कलश स्थापना का समय अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 01 मिनट से 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। इस समय आप अपनी पूजा-पाठ और घट स्थापना कर सकते हैं।
- पूजा से पहले कलश स्थापना का विधान है।
- आप सबसे पहले एक मिट्टी के पात्र को लेकर उसमें थोड़ी सी मिट्टी डाल दें।
- फिर इस पात्र में जौ के बीज डालकर उसे मिलाएं।
- इसके बाद मिट्टी के पात्र पर पानी से छिड़काव करें।
- अब आप एक तांबे का लोटा लेकर उसपर स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं।
- उसके ऊपरी हिस्से में मौली बांधकर साफ जल भरें।
- इस जल में दूब, अक्षत, सुपारी और कुछ पैसे रख दें।
- अशोक की पत्तियां कलश के ऊपर रख दें।
- अब पानी के एक नारियल को लाल चुनरी से लपेटकर मौली बांध दें।
- इस नारियल को कलश के बीच में रख दें, और बाद में इसे पात्र के मध्य में स्थापित कर दें|
पूजन विधि:-
- स्नान करने के बाद ही पूजा घर को साफ करें और फिर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं।
- मिट्टी के बर्तन में जौ बोएं।
- एक कलश में गंगाजल भरकर उसमें सुपारी, दूर्वा घास, अक्षत और सिक्के डालें।
- कलश के मुख पर आम के पत्ते रखें और उस पर नारियल रखें।
- कलश को जौ के बर्तन के ऊपर रखें।
- देवी दुर्गा का आह्वान करें और नौ दिनों तक उनकी विधिपूर्वक पूजा करें।
- इस दौरान भक्त नौ दिनों तक उपवास रखें।
- देवी दुर्गा की प्रतिदिन सुबह और शाम भाव के साथ आरती करें।
- रोजाना या फिर अष्टमी-नवमी के दिन कन्या पूजन करें और उन्हें भोजन कराएं।
- इस दौरान सात्विक भोजन करें और तामसिक भोजन से बचें।
- घर में स्वच्छता बनाए रखें और किसी से विवाद न करें।
- इस दौरान तामसिक चीजों से दूर रहें।
- इस दौरान महिलाओं का अपमान न करें।